Dar Beshumar / डर बेशुमार (Poetry On Resilience)

Dar Beshumar / डर बेशुमार (Poetry On Resilience)     कुछ कर दिखाने की चाह थी दिल में, नाम कमाने का था जुनून  लेकिन मंजिल थी दूर, राह थी मुश्किल, लग रहा था डर बेशुमार  हो रहा था हौंसला पस्त बार-बार, लोगों की निराशाजनक बातों से  लड़खड़ा रहे थे कदम मेरे यहाँ-वहाँ, हुनर को मेरे कमत्तर आँकने से  रुक जाती कुछ सोचने, उनकी व्यंगयात्मक हँसी कानों में पड़ते ही    नहीं आ रही थी नज़र दूर तक निगाहों को मेरी, प्रोत्साहन की रोशनी   फिर भी था यकीं खुद पे, कदाचित इसलिए बढ़ रही थी लक्ष्य की ओर  यूँ तो छाई थी धुंध हर ओर, फिर भी दिख रही था उम्मीद का उजाला    होगा ख्वाब यकीनन मुकम्मल, चाहे दुनिया बिछाए लाख काँटे राहों में  कुछ ऐसे थे शब्द वो, गूँज रहे थे जो चहुँ ओर लगातार वायुमंडल में  मिली हिम्मत जिनसे, बड़े कदम आगे, फिर भी लग रहा था डर बेशुमार                                                -दीपिका जैन



Dar Beshumar / डर बेशुमार (Poetry On Resilience)

 

कुछ कर दिखाने की चाह थी दिल में, नाम कमाने का था जुनून

लेकिन मंजिल थी दूर, राह थी मुश्किल, लग रहा था डर बेशुमार

हो रहा था हौंसला पस्त बार-बार, लोगों की निराशाजनक बातों से

लड़खड़ा रहे थे कदम मेरे यहाँ-वहाँ, हुनर को मेरे कमत्तर आँकने से

रुक जाती कुछ सोचने, उनकी व्यंगयात्मक हँसी कानों में पड़ते ही  

नहीं आ रही थी नज़र दूर तक निगाहों को मेरी, प्रोत्साहन की रोशनी 

फिर भी था यकीं खुद पे, कदाचित इसलिए बढ़ रही थी लक्ष्य की ओर

यूँ तो छाई थी धुंध हर ओर, फिर भी दिख रही था उम्मीद का उजाला  

होगा ख्वाब यकीनन मुकम्मल, चाहे दुनिया बिछाए लाख काँटे राहों में

कुछ ऐसे थे शब्द वो, गूँज रहे थे जो चहुँ ओर लगातार वायुमंडल में

मिली हिम्मत जिनसे, बड़े कदम आगे, फिर भी लग रहा था डर बेशुमार

                                              -दीपिका जैन

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