Asha Aur Nirasha / आशा और निराशा (Poetry On Life)

Asha Aur Nirasha / आशा और निराशा (Poetry On Life)     गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया   कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया    चहुँ ओर थी नाउम्मीदी, नज़र ना आ रही थी कोई उम्मीद   परन्तु मन के किसी कौने में भरी पड़ी थी आशा ही आशा   जीवन में आगे बढ़ने की आशा, अधूरे काज पूरे करने की आशा   ढूँढा बहुत पर आया नहीं नज़र ख़ुद में कही अँधेरा निराशा का   गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया   कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया    फिर क्या था, मैंने आशाओं से भरे इस संदूक को उठाया   लिए अपने लबों पे मुस्कान, शुरू किया सफर ये दुबारा   और सीखा ये फ़लसफ़ा, आशा भी खुद से हैं और निराशा भी   ग़र थामना हैं तो आशाओं को थामों, पर कुछ ऐसे छूट ना पाए वो हाथों से   गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया   कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया       -दीपिका जैन



Asha Aur Nirasha / आशा और निराशा (Poetry On Life)

 

गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया 

कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया  

चहुँ ओर थी नाउम्मीदी, नज़र ना आ रही थी कोई उम्मीद 

परन्तु मन के किसी कौने में भरी पड़ी थी आशा ही आशा 

जीवन में आगे बढ़ने की आशा, अधूरे काज पूरे करने की आशा 

ढूँढा बहुत पर आया नहीं नज़र ख़ुद में कही अँधेरा निराशा का 

गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया 

कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया  

फिर क्या था, मैंने आशाओं से भरे इस संदूक को उठाया 

लिए अपने लबों पे मुस्कान, शुरू किया सफर ये दुबारा 

और सीखा ये फ़लसफ़ा, आशा भी खुद से हैं और निराशा भी 

ग़र थामना हैं तो आशाओं को थामों, पर कुछ ऐसे छूट ना पाए वो हाथों से 

गुजर रहा था सफ़र ज़िन्दगी का, एकाएक ही एक मोड़ आया 

कठिन था मोड़ वो, ऐसा लगा जैसे की आखिरी पल हैं आया  

 

-दीपिका जैन 

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