Prakriti Kii Khoobsurati / प्रकृति की खूबसूरती (Poetry On Nature)
Prakriti Kii Khoobsurati / प्रकृति की
खूबसूरती (Poetry On Nature)
प्रकृति की खूबसूरती को ढ़ालने बैठी थी शब्दों में,
लेकर कलम-दवात
आए नहीं ज़ेहन में शब्द, ढूँढा शब्दकोश में तो हाथ लगी
निराश मुझे
अनगिनीत है कुदरत में दृश्य कथनीय, पर मोहताज नहीं वो
शब्दों के
कुछ ऐसा हुआ प्रतीत मुझे, देखकर नजारें ये आकर्षक, व
अविस्मरणीय
नजरें उठाओ तो शाम ढले, दिखते हैं आसमाँ में चाँद संग
बतियाते तारें
मध्याह्न दिनकर बिखेरता उष्णता चहुँ ओर, दिखाते हुए
प्रचंड रूप अपना
ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखा रहे अपनी शान, धरा पे बहते
नदियाँ, सागर, झरने
उपवन है कुछ ऐसे, हटती नहीं नज़र उनसे, खूबसूरती उनकी
बेमिसाल
लगा रहे रंग-बिरंगें फूलों पे चार चाँद, मंडराते हुए
भँवरें उन पर हर क्षण
यकीनन बेजोड़ है ये प्रकृति, मुमकिन नहीं मिलना शब्द
तारीफ़ में इसकी
प्रकृति की खूबसूरती को ढ़ालने बैठी थी शब्दों में,
लेकर कलम-दवात
आए नहीं ज़ेहन में शब्द, ढूँढा शब्दकोश में तो हाथ लगी
निराश मुझे
-दीपिका जैन

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