Pryawaran Ki Kahani, Usi Ki Jubani / पर्यावरण की कहानी, उसी की जुबानी (Poetry On World Environment Day)
नष्ट हो रहा हूँ हर क्षण, सोच ये होती है तकलीफ़
नहीं किसी को चिंता मेरी, देख ये होती है तकलीफ़
जहाँ देखो डालते ढ़ेर कचरे का, प्रदूषित हो रहा हूँ मैं
कैसे रखूँ वातावरण शुद्ध, स्वयं अशुद्ध हो रहा हूँ मैं
खतरे में है अस्तित्व मेरा, कैसे समझाऊँ दर्द अपना मैं
नष्ट हो रहा हूँ हर क्षण, सोच ये होती है तकलीफ़
नहीं किसी को चिंता मेरी, देख ये होती है तकलीफ़
काट रहा है मनुष्य निरंतर वृक्ष, खत्म हो रहा हूँ मैं
कर रहा उधान ध्वस्त, इमारतों के लिए, सह रहा हूँ मैं
कहाँ जायेंगे पशु-पक्षी बिन हरियाली, जानता नहीं मैं
नष्ट हो रहा हूँ हर क्षण, सोच ये होती है तकलीफ़
नहीं किसी को चिंता मेरी, देख ये होती है तकलीफ़
बहाती आँसू धरा दिन प्रतिदिन, देख दुखी होता हूँ मैं
किसे सुनाए व्यथा वो अपनी दर्द भरी, सोचता हूँ मैं
है गुजारिश, बचाओ पर्यावरण, तिल-तिल मर रहा हूँ मैं
नष्ट हो रहा हूँ हर क्षण, सोच ये होती है तकलीफ़
नहीं किसी को चिंता मेरी, देख ये होती है तकलीफ़
-दीपिका जैन

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