Aashayein / आशाएँ (Poetry On Optimism)
Aashayein / आशाएँ (Poetry On Optimism)
कुछ कदमों की ही दूरी पर थी मंजिल मेरी
मुकम्मल होने की कगार पे था ख्वाब मेरा
असीम रोमांच था, धड़क रहा था दिल बेकाबू
एक क्षण यकीं होता मुझे अपनी कामयाबी
पे
फिर सोचती, कहीं ये कोई सपना तो नहीं
मेरा
लेकिन ये हक़ीक़त थी ज़िंदगी की मेरी बेशकीमती
कुछ कदमों की ही दूरी पर थी मंजिल मेरी
मुकम्मल होने की कगार पे था ख्वाब मेरा
फिर यकायक ही तेज हवा का एक झोंका आया
ढह गया सबकुछ, बिखर गया सपना होकर चूर-चूर
लेकिन टूटा नहीं हौंसला मेरा, कदम बढ़ाए
मैंने अपने
और छू ली मंजिल, और कर लिया ख्वाब
मुकम्मल
कुछ कदमों की ही दूरी पर थी मंजिल मेरी
मुकम्मल होने की कगार पे था ख्वाब मेरा
-दीपिका जैन

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