Tapti Garmi / तपती गर्मी ( Poetry On Summer Season)
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Tapti Garmi / तपती गर्मी ( Poetry On Summer Season)
बीत गयी सर्दी, गर्मियों ने दस्तक दी है
हर शख्स को, तपन सूरज की चुभती है
उगलता जब ये आग, धूप बनकर लगती है
सूर्यप्रकाश के समक्ष, एहसास अग्नि-सा होता है
उष्ण बयार भाती नहीं, व्याकुलता ये बढ़ाती हैं
हो चाहे वो इंसा, पशु, पक्षी या अन्य कोई जीव
बीत गयी सर्दी, गर्मियों ने दस्तक दी है
हर शख्स को, तपन सूरज की चुभती है
ऐसे मौसम में, हर पल शीतलता याद आती है
शीतल पेय पदार्थ जन-जन के मन को भाता है
इमारतों में चलते निरंतर कूलर, पंखे, ए. सी. है
अन्य जीव भी ठंडा-ठंडा ठिकाना तलाशते है
बीत गयी सर्दी, गर्मियों ने दस्तक दी है
हर शख्स को, तपन सूरज की चुभती है
-दीपिका जैन

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