Thak Gayi Hai Ladte - Ladte / थक गयी है लड़ते - लड़ते ( Poetry On Struggle In Life)


Thak Gayi Hai Ladte - Ladte / थक गयी है लड़ते - लड़ते ( Poetry On Struggle In Life)   दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से  कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से     घटना का इल्म हो, या ना हो उसे दोषी वो ही है    ऐसा सुनती है हमेशा, कभी गैरों से, कभी अपनों से    सोचा करती थी, यकीनन थम जाएगा सिलसिला ये  कोई तो आएगा ज़िंदगी में उसकी, जो लेगा पक्ष उसका     दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से  कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से     भ्रम था वो उसका, ना ही कोई आया, और ना आएगा  स्वार्थी है संसार, ना इसमे कोई है अपना, ना है पराया    होता है प्रतीत ऐसा, उठाना होगा अब तो शस्त्र वाणी का  करेगा जो प्रहार भविष्य में, देना होगा उसको जवाब करारा     दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से  कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से                                     -दीपिका जैन


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Thak Gayi Hai Ladte - Ladte / थक गयी है लड़ते - लड़ते ( Poetry On Struggle In Life)


दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से

कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से

 

घटना का इल्म हो, या ना हो उसे दोषी वो ही है

  ऐसा सुनती है हमेशा, कभी गैरों से, कभी अपनों से  

सोचा करती थी, यकीनन थम जाएगा सिलसिला ये

कोई तो आएगा ज़िंदगी में उसकी, जो लेगा पक्ष उसका

 

दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से

कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से

 

भ्रम था वो उसका, ना ही कोई आया, और ना आएगा

स्वार्थी है संसार, ना इसमे कोई है अपना, ना है पराया  

होता है प्रतीत ऐसा, उठाना होगा अब तो शस्त्र वाणी का

करेगा जो प्रहार भविष्य में, देना होगा उसको जवाब करारा

 

दास्तां है उस नारी की थक गयी जो लड़ते हुए ज़माने से

कदम-कदम पर खुद को सही साबित करते हुए मुद्दतों से

                                   -दीपिका जैन


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