Mard Ki Dastan / मर्द की दास्तान (Poetry On Men)
Mard Ki Dastan / मर्द की दास्तान (Poetry On Men)
अजीब ये विडंबना है, हर मर्द की यही दास्तान है
भूल जाते सब ये, आखिरकार वो भी तो एक इंसा है
नज़र नहीं आती दुनिया में पीड़ा पुरुष की किसी को
आ जाए अगर उसकी आँखों में आँसू किसी बात पे
मर्द रोते नहीं, सुना दिया जाता है जुमला ये उसको
तकलीफ़ में भरे आह तो कहते मर्द को दर्द नहीं होता
अजीब ये विडंबना है, हर मर्द की यही दास्तान है
भूल जाते सब ये, आखिरकार वो भी तो एक इंसा है
क्यों उसको बना दिया जाता एक पत्थर जैसा कठोर
उसकी भी होती भावनायें हैं, ये क्यों नहीं जाता समझा
क्यों पुरुषों के कंधों पे, तू मर्द है, वाक्य का डाल
भार
छिन लिया जाता हक उससे, कहने का पीड़ा उसकी
अजीब ये विडंबना है, हर मर्द की यही दास्तान है
भूल जाते सब ये, आखिरकार वो भी तो एक इंसा है
-दीपिका जैन

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