Zindagi Jeene Ka Dhang / ज़िंदगी जीने का ढ़ंग (Poetry On Life)
पल-पल गुजरती ज़िंदगी कुछ कह रही है
शायद खुद को जीने का ढ़ंग समझा रही है
यूँ तो है ये एक पहेली, सुलझाना जिसको दुष्कर
कुछ कदम चले फूलों
पर जीवन के सफ़र में
तो हो जाए कब काँटों से भेंट हमारी, इल्म नहीं
फिर भी किसी ना किसी तरक़ीब से ये हमारी
मुश्किलें आसां बनाने की युक्ति सुझा रही है
मुस्कुराने से हो जाती हर उलझन नदारद
ये कह गमों से लड़ने का तरीका बता रही है
पल-पल गुजरती ज़िंदगी कुछ कह रही है
शायद खुद को जीने का ढ़ंग समझा रही है
-दीपिका जैन

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