Ramniya Drishya / रमणीय द्रश्य (Poetry On Nature)
पुष्पों से सजी सुगंधित कोई चादर बिछी हो
महक जिनकी बिखर रही चहुँ ओर उपवन में
बैठते उन पर प्रतिक्षण भँवरें, करते वो गुन-गुन
रंग-बिरंगीं तितलियाँ भी आती नज़र इधर-उधर
दृष्टिगोचर हो रहा दूर कहीं झरना शीतल जल का
फ़लक से चाँद-सितारे, दे रहे गवाही चाँदनी-रात में
लग रही है शोभनीय धरा, प्रकृति के इस उपहार से
हो जाता मन आनंदित, देख नज़ारा ये रमणीय
रुक जाए वक्त यहीं, है दुआ, खुदा से ये बार-बार
आता रहे नज़र कुदरत का ये करिश्मा अविराम
-दीपिका जैन

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