Qubool-E-Ishq / कबूल -ए -इश्क (Poetry On Love)
अपने घर की खिड़की से झाँकती तू, शरमाते हुए
हवा में उड़ती जुल्फों को सलीके से, संभालते हुए
इधर-उधर देखती खुद को सुकून से भरा जताते हुए
कभी झुकाती, तो कभी उठाती नजरें, झिझकते हुए
कभी सबसे नजरें चुरा, देखती मेरी ओर मुस्कुराते हुए
देखा है मैंने तुझे कई बार जलसों में, खिलखिलाते हुए
लेकिन ना जाने क्यों, तू वहाँ करती अनदेखा घबराते हुए
है इल्म तेरी मोहब्बत का, जता रही है जिसे तू छुपाते
हुए
कर दूँ अगर मैं इजहार-ए-मोहब्बत, गीत कोई गाते हुए
क्या कबूल करेगी प्यार मेरा, तू भी गुनगुनाते हुए ?
-दीपिका जैन

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