Sapne Haqiqat Mein / सपनें हक़ीक़त में (Poetry On Women Empowerment )

 Sapne Haqiqat Mein / सपनें हक़ीक़त में (Poetry On Women Empowerment )  सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए  ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए     निकली थी काँटों भरी राहों पे, नहीं थी परवाह चुभने की  इंतजार था तो आगामी समय में, मिलने वाली सफलता का  हर कदम था मुश्किलों भरा, नहीं था कोई हाथ थामने वाला  बस थी तो केवल बेशुमार रुकावटें, खिलाफ़ थे मेरे अपने सभी     सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए  ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए     गर मैं अम्बर, तो वो धरा, मुमकिन नहीं था मिलन विचारों का  क्या करोगी पढकर, घर संभालना है तुमको, कुछ ऐसा था कहना  मुश्किल था उनके लिए मेरे जीवन के लक्ष्य को समझ पाना  फिर भी बढ़ती गयी हर अड़चन पार कर, करने हासिल मंजिल       सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए  ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए    मुकम्मल हुआ सपना, मिल गयी मंजिल तलाश थी जिसकी  लेकिन अपनों को खोया, अपना कुछ पाने के लिए ज़िंदगी में  उठता है बार-बार प्रश्न ये मन में, क्या नारी होने कि ये सज़ा है  क्यों नहीं देते दिल से हक़ उसे, पंख फ़ैला आसमां में उड़ने का     सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए  ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए                                      -दीपिका जैन


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Sapne Haqiqat Mein / सपनें हक़ीक़त में (Poetry On Women Empowerment )

सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए

ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए

 

निकली थी काँटों भरी राहों पे, नहीं थी परवाह चुभने की

इंतजार था तो आगामी समय में, मिलने वाली सफलता का

हर कदम था मुश्किलों भरा, नहीं था कोई हाथ थामने वाला

बस थी तो केवल बेशुमार रुकावटें, खिलाफ़ थे मेरे अपने सभी

 

सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए

ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए

 

गर मैं अम्बर, तो वो धरा, मुमकिन नहीं था मिलन विचारों का

क्या करोगी पढकर, घर संभालना है तुमको, कुछ ऐसा था कहना

मुश्किल था उनके लिए मेरे जीवन के लक्ष्य को समझ पाना

फिर भी बढ़ती गयी हर अड़चन पार कर, करने हासिल मंजिल  

 

सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए

ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए


मुकम्मल हुआ सपना, मिल गयी मंजिल तलाश थी जिसकी

लेकिन अपनों को खोया, अपना कुछ पाने के लिए ज़िंदगी में

उठता है बार-बार प्रश्न ये मन में, क्या नारी होने कि ये सज़ा है

क्यों नहीं देते दिल से हक़ उसे, पंख फ़ैला आसमां में उड़ने का

 

सपनों को अपने हक़ीक़त में बदलने की ख्वाहिश लिए

ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने की ख्वाहिश लिए

                                    -दीपिका जैन

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