Gagan Pe Chand Sitare / गगन पे चाँद सितारें (Poetry On Nature )
पड़ती जब छवि इनकी, नदियाँ, सागर, और झरनों पे
रूप निखर जाता प्रकृति का, शब्दहीन होता है वो मंज़र
नभ पे चमकते तारें, ज़मीं पे सागर विशाल संग जलनाद
पड़ते ही मधुर स्वर ये कर्णपटल पे, हो जाता है मन
प्रसन्न
इतनी सुंदर लगती है रात, नहीं किसी तारीफ़ की मोहताज़
होता प्रतीत कुछ ऐसा किसी कवि की कविता हो ये बेमिसाल
शांत, मनभावन-सा द्रश्य ये कुदरत का, यकीनन है अद्भुत
मुस्कुराता होगा खुदा भी देख ये नज़ारा अपनी कारिगीरी
पे
गगन पे चमकते चाँद सितारें, बना देते रात खूबसूरत
पड़ती जब छवि इनकी, नदियाँ, सागर, और झरनों पे
-दीपिका जैन

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