Bewajah Muskurana / बेवजह मुस्कुराना (Poetry On Happiness )
हयात में
खुश रहने का कोई सबब हो जरूरी तो नहीं
बेवजह
मुस्कुराने की फ़ितरत भी काबिल-ए-तारीफ़ है
गुजर गए
ग़म सारे, बह गए आँसू बेशुमार अतीत में
जीते है
जो ज़िंदगी इस ख्याल के संग, रहते हैं खुश
तकलीफों
के लिए ज़रा भी जगह नहीं है उनके करीब
गर आती है
कोई मुसीबत तो ज़ेहन तक पहुँचती नहीं
हयात में
खुश रहने का कोई सबब हो जरूरी तो नहीं
बेवजह
मुस्कुराने की फ़ितरत भी काबिल-ए-तारीफ़ है
इल्म है मुश्किलों
से मिलेगी ऐसी शख्सियत इस जहान में
लेकिन
ख्वाहिश है हूबहू ऐसा बनने की, ज़िंदगी जीने की
मसलों को
तवज्जो ना देने की, हर वक्त लबों पे हँसी की
यकीनन
ख्वाब हैं ये बुलंद, बहराल होंगे मुकम्मल है यकीन
हयात में
खुश रहने का कोई सबब हो जरूरी तो नहीं
बेवजह
मुस्कुराने की फ़ितरत भी काबिल-ए-तारीफ़ है
-दीपिका जैन

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