Kahani Prakriti Ki / कहानी प्रकृति की (Poetry On Nature)
Kahani Prakriti Ki / कहानी प्रकृति की
(Poetry On Nature)
देखती हूँ चहुँ ओर अपने तो, लगती हूँ मुस्कुराने
सोचती हूँ बार-बार यकीनन खुशकिस्मती है ये मेरी
बिन माँगे मिला है प्रकृति का अनमोल उपहार मुझे
निगाहें उठाऊँ तो देखूँ आसमां, संग चाँद-सितारों के
गवाह आशिकों का चाँद, बिखेरता है धरा
पे चाँदनी बेशुमार
झुकाऊँ तो नजर
आते नजारें अनगिनीत धरा पे अविस्मरणीय
कहीं साहिल
को चूमती लहरें सागर की, तो कहीं हसीन वादियाँ
लगा देते
चार चाँद प्रकृति की सुंदरता पे बहते झरने निर्मल जल के
उपवनों में मंडराते भँवरें, रंग-बिरंगें पुष्पों पे
करते रसपान उनका
तो कभी यकायक सुनाई देता कलरव पक्षियों का मधुर
संगीत-सा
यूँ तो बहुत सारी है बातें करने को इस अनुपम सृष्टि
के बारे में
सच कहूँ तो संभव नहीं प्रकृति की खूबसूरती का बखान
करना
देखती हूँ चहुँ ओर अपने तो, लगती हूँ मुस्कुराने
सोचती हूँ बार-बार यकीनन खुशकिस्मती
है ये मेरी
-दीपिका जैन

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