Raatri / रात्रि (Poetry On Night)

Raatri / रात्रि (Poetry On Night)    संग बेशुमार तारों के, अर्धचंद्र नभ में नज़र आ रहा है   मंद-मंद पड़ रहा प्रकाश धरा पे, मुस्काते हुए निरंतर है   यकीनन दृश्य है ये अद्भुत, अर्धरात्रि की  मधुर बेला है    ठंडी-ठंडी चल रही पवन, सुहाना प्रतीत हो रहा मौसम है   कहीं सुनाई देता स्वर निशाचर का, तो कहीं छाया मौन है   उपवन में बिखरी अनगिनित मोतियों-सी ओस की बूँदें है   देख मंज़र ये हो रहा मन अतिप्रसन्न, बीत ना जाये ये रात है  है अभिलाषा थम जाए वक़्त यही,  हो जाये कोई तिलिस्म है   संग बेशुमार तारों के, अर्धचंद्र नभ में नज़र आ रहा है   मंद-मंद पड़  रहा प्रकाश  धरा पे, मुस्काते हुए निरंतर है     -दीपिका जैन



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Raatri / रात्रि (Poetry On Night)


संग बेशुमार तारों के, अर्धचंद्र नभ में नज़र आ रहा है 

मंद-मंद पड़ रहा प्रकाश धरा पे, मुस्काते हुए निरंतर है 

यकीनन दृश्य है ये अद्भुत, अर्धरात्रि की  मधुर बेला है 

 ठंडी-ठंडी चल रही पवन, सुहाना प्रतीत हो रहा मौसम है 

कहीं सुनाई देता स्वर निशाचर का, तो कहीं छाया मौन है 

उपवन में बिखरी अनगिनित मोतियों-सी ओस की बूँदें है 

देख मंज़र ये हो रहा मन अतिप्रसन्न, बीत ना जाये ये रात है

है अभिलाषा थम जाए वक़्त यही हो जाये कोई तिलिस्म है 

संग बेशुमार तारों के, अर्धचंद्र नभ में नज़र आ रहा है 

मंद-मंद पड़  रहा प्रकाश  धरा पे, मुस्काते हुए निरंतर है


 -दीपिका जैन

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