Yaadein Sandook Mein / यादें सन्दूक में (Poetry On Childhood Memories)

Yaadein Sandook Mein / यादें सन्दूक में (Poetry On Childhood Memories)   मासूमियत भरा है बचपन, गुजरे इसका हर लम्हा धीमे-धीमे  संजो ले हम इसे यादों के सन्दूक में, और छुपा दे उसे मन में  जीवन के किसी मोड पे, आए याद जब गुजरे हुए बचपन की  खोले यादों का पिटारा, बाँटे उसे सब संग, और मुस्काए घड़ी-घड़ी  कभी खोले राज माँ को सताने का, कभी दादी से निंदा करने का  खौफ पापा का था बेशुमार, है ये बचपन का सबसे अहम एहसास  नन्हे-नन्हे मित्रों संग मिल करते थे शैतानियाँ, पड़ती थी फिर डाँट  कभी बहाते थे आँसू, तो कभी आते ना थे हरकतों से अपनी बाज  बिन सोचे-समझे जिद करना समझते थे अपना जन्मसिद्ध अधिकार  होती थी कभी वो पूरी, तो कभी पड़ती थी पापा की बीच-बाजार फटकार  छुप जाते थे हो भयभीत पीछे माँ के, ना जाने क्यों होता था ऐसा बार-बार  कुछ खट्टी-कुछ मीठी अनमोल ये स्मृति है, खो ना जाए मुझसे ये कहीं  लगा दूँ ताला सन्दूक का, छुपा दूँ उसकी चाभी कहीं, है जिसमे बचपन मेरा  जीवन के किसी मोड पे, आए याद जब गुजरे हुए बचपन की  खोले यादों का पिटारा, बाँटे उसे सब संग, और मुस्काए घड़ी-घड़ी    -दीपिका जैन

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Yaadein Sandook Mein / यादें सन्दूक में (Poetry On Childhood Memories)

मासूमियत भरा है बचपन, गुजरे इसका हर लम्हा धीमे-धीमे

संजो ले हम इसे यादों के सन्दूक में, और छुपा दे उसे मन में

जीवन के किसी मोड पे, आए याद जब गुजरे हुए बचपन की

खोले यादों का पिटारा, बाँटे उसे सब संग, और मुस्काए घड़ी-घड़ी

कभी खोले राज माँ को सताने का, कभी दादी से निंदा करने का

खौफ पापा का था बेशुमार, है ये बचपन का सबसे अहम एहसास

नन्हे-नन्हे मित्रों संग मिल करते थे शैतानियाँ, पड़ती थी फिर डाँट

कभी बहाते थे आँसू, तो कभी आते ना थे हरकतों से अपनी बाज

बिन सोचे-समझे जिद करना समझते थे अपना जन्मसिद्ध अधिकार

होती थी कभी वो पूरी, तो कभी पड़ती थी पापा की बीच-बाजार फटकार

छुप जाते थे हो भयभीत पीछे माँ के, ना जाने क्यों होता था ऐसा बार-बार

कुछ खट्टी-कुछ मीठी अनमोल ये स्मृति है, खो ना जाए मुझसे ये कहीं

लगा दूँ ताला सन्दूक का, छुपा दूँ उसकी चाभी कहीं, है जिसमे बचपन मेरा

जीवन के किसी मोड पे, आए याद जब गुजरे हुए बचपन की

खोले यादों का पिटारा, बाँटे उसे सब संग, और मुस्काए घड़ी-घड़ी


-दीपिका जैन

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