Kashmkash / कशमकश ( Poetry On Confusion)



Kashmkash / कशमकश ( Poetry On Confusion) 


बरसों से इंतजार था जिस घड़ी का वो आ गयी

करो ज़ाहिर खुशी या छुपा लूँ उसे है कशमकश

शब्द नहीं कहने को कुछ पास मेरे आज यकीनन

कैसे बताऊँ जज़्बात अपने सोच रही हूँ आज मैं

यूँ तो छोड़ दी थी उम्मीद मैंने मान ली थी हार

सोचा था ना होगी कभी ख्वाहिश मुकम्मल मेरी

लेकिन आज जब मिला है फल मेहनत का मुझे

तो कैसे करूँ यकीं, किस संग बाँटू खुशी अपनी

वैसे तो बसते हैं कद्रदान बहुत मेरे इस दुनिया में

लेकिन नफरत करने वालों की भी कमी नहीं हैं

जो शायद चाहते नहीं प्रगति और खुशियाँ मेरी

लग ना जाए नज़र उनकी है खौफ दिल में मेरे  

बरसों से इंतजार था जिस घड़ी का वो आ गयी

करो ज़ाहिर खुशी या छुपा लूँ उसे है कशमकश

 

-दीपिका जैन

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