Kahne Ko Kuch Nahi Mera Yahan / कहने को कुछ नहीं मेरा यहाँ (Poetry On Women)
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Kahne Ko Kuch Nahi Mera Yahan / कहने को कुछ नहीं मेरा यहाँ (Poetry On Women)
यूँ तो रहती हूँ हर पल मैं यहाँ
लेकिन कहने को कुछ नहीं मेरा यहाँ
याद है लम्हा वो पार की थी जब चौखट ये
किया था वादा खुद से अपनाऊँगी मन से ये घर-संसार
आसां नहीं थी राह, नहीं था कोई उस दुनिया में अपना सा
फिर भी बढ़ा रही थी क़दम चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा लिए
यूँ तो रहती हूँ हर पल मैं यहाँ
लेकिन कहने को कुछ नहीं मेरा यहाँ
गुजर रहे हैं बरस पे बरस पर होता नहीं है एहसास अपना-सा
रह रही हूँ ग़ैरों के बीच लगता है हर पल कुछ ऐसा-सा
कैसी ये विडंबना है नारी जीवन की, नहीं शब्द कुछ कहने को
गुजरती है जिस घर उम्र उसकी लगता नहीं वो कभी अपना-सा
यूँ तो रहती हूँ हर पल मैं यहाँ
लेकिन कहने को कुछ नहीं मेरा यहाँ
-दीपिका जैन

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