Drishya / दृश्य (Poetry On Nature)
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Drishya / दृश्य (Poetry On Nature)
अर्ध चन्द्र संग तारों के आसमां की बढा रहा शोभा है
द्रश्य है ये मनमोहक, देख इसे कह रहा हर शख्स है
पड़ती है नजर जब अगले ही पल ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पे
होता नहीं यकीन खुदा की इस अविस्मरणीय कला पे
थमता नहीं सिलसिला ये अभी क्योंकि नजरों के सामने है
रंग-बिरंगे फूलों और विशालकाय वृक्षों से लदा उपवन है
कहीं सागर तो कहीं बहती नदियाँ क्या-क्या बसाऊँ निगाहों मे
फलक पे उड़ते पंछी देखूँ या सुनूँ उनका मधुर कलरव में
कायनात की खूबसूरती देख होता नहीं यकीन खुद की तकदीर पे
बस करनी है हिफाज़त इसकी, लिए मीठी-सी मुस्कान लबों पे
-दीपिका जैन

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