Asambhav Hai Khoobsurati Itni / असंभव है खूबसूरती इतनी (Poetry On Nature)
Asambhav
Hai Khoobsurati Itni / असंभव है खूबसूरती इतनी (Poetry
On Nature)
द्रश्य
अतुलनीय था नज़रों के सामने मेरे, यकीं करना था उस पे मुश्किल
असभंव
है खूबसूरती इतनी, ना जाने क्यों ख्याल आ रहा था ज़ेहन में ये
कहीं
सितारों की चादर ओड़े आसमां निरंतर एकटक निहार रहा था धरा को
तो कहीं
साहिल को चूमती लहरें सागर की, तो कहीं बह रहा था झरना अविरल
पर्वत
ऊँचे-ऊँचे मुस्कुरा रहे थे छूकर आसमां, यकीनन अविश्वसनीय था द्रश्य ये
यूँ तो
देखे है नजारें बेशुमार कुछ इसी तरह के जीवन में पर ये था कुछ अलग
द्रश्य
अतुलनीय था नज़रों के सामने मेरे, यकीं करना था उस पे मुश्किल
असभंव
है खूबसूरती इतनी, ना जाने क्यों ख्याल आ रहा था ज़ेहन में ये
अगले
ही क्षण पड़ी नजर उपवन पे, की नहीं जा सकती तारीफ जिसकी शब्दों में
दिख रहे
थे फूल उस में अनेक रंगों के, कुछ थे पूरे खिलें तो कुछ थे अधखिले से
भँवरे
भी गुनगुना रहे थे गीत मधुर बैठ पुष्पों पे, कर रहे थे रसपान उनका
तो कहीं
बिखेर रहे थे तरुवर छाया अपनी शीतल, देख ये सब हो गया मन प्रसन्न
द्रश्य
अतुलनीय था नज़रों के सामने मेरे, यकीं करना था उस पे मुश्किल
असभंव
है खूबसूरती इतनी, ना जाने क्यों ख्याल आ रहा था ज़ेहन में ये
-दीपिका जैन

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