Samet Liye Hain Dard / समेट लिए हैं दर्द (A Sad Poetry )
Samet
Liye Hain Dard / समेट लिए हैं दर्द (A
Sad Poetry)
समेट
लिए है दर्द सारे आँचल में अपने
बिना
किसी शिकवा या शिकायत के मैंने
कर दी
कुर्बान खुशियाँ अपनी आसानी से
यूँ तो
उठ रहे हैं सवाल हजार ज़ेहन में मेरे
क्यों
मुझे ही मिले हैं दर्द सारे चाहती हूँ जवाब
सोचती
हूँ क्यों नहीं किस्मत में खुशियाँ मेरे
समेट
लिए है दर्द सारे आँचल में अपने
बिना
किसी शिकवा या शिकायत के मैंने
चाहे
हो नादान बचपन या हो वक्त जवानी का
गुजारा
है संग आँसुओं के दबा मुस्कान होंठों की
फिर भी
चाहती हूँ जानना वजह अपने दुखों की
क्या
मिलेगी कभी खुशी मुझको पल दो पल की
समेट
लिए है दर्द सारे आँचल में अपने
बिना
किसी शिकवा या शिकायत के मैंने

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