Naa Jaane Kahan Kho Gaye / ना जाने कहाँ खो गए (Poetry On Children'sDay)

Naa Jaane Kahan Kho Gaye / ना जाने कहाँ खो गए (Poetry On Childhood)  ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन   ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे बेशुमार बचपन के वो दिन     करना तरह-तरह की शैतानियाँ संग सखियों के रात-ओ-दिन   सताना माँ को बेवजह ही, खाना डॉँट उनकी पूरा-पूरा दिन   गुस्सा पापा का कर जाता था भयभीत मुझे, कैसे थे वो दिन     ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन   ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे बेशुमार बचपन के वो दिन     जाना छुप अगले ही पल दादी की गोद में, आते हैं याद वो दिन  दादू संग खेलना, बतियाना बातें ढ़ेरों, याद आते हैं वो दिन   कैसे भूल जाऊँ भाई-बहन संग बिताए अविस्मरणीय वो दिन     ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन   ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे  बेशुमार बचपन के वो दिन     -दीपिका जैन

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Naa Jaane Kahan Kho Gaye / ना जाने कहाँ खो गए (Poetry On Children's Day)

ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन 

ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे बेशुमार बचपन के वो दिन 


करना तरह-तरह की शैतानियाँ संग सखियों के रात-ओ-दिन 

सताना माँ को बेवजह ही, खाना डॉँट उनकी पूरा-पूरा दिन 

गुस्सा पापा का कर जाता था भयभीत मुझे, कैसे थे वो दिन 


ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन 

ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे बेशुमार बचपन के वो दिन 


जाना छुप अगले ही पल दादी की गोद में, आते हैं याद वो दिन 

दादू संग खेलना, बतियाना बातें ढ़ेरों, याद आते हैं वो दिन 

कैसे भूल जाऊँ भाई-बहन संग बिताए अविस्मरणीय वो दिन 


ना जाने कहाँ खो गए अतीत के गर्भ में बचपन के वो दिन 

ना जाने क्यों आते हैं याद मुझे  बेशुमार बचपन के वो दिन 


-दीपिका जैन 

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