Parchai Maa Ki / परछाई माँ की (Poetry On Mother)

Parchai Maa Ki / परछाई माँ की (Poetry On Mother)    कहतें हैं सब मुझको परछाई माँ की, सुन होता है गर्व   हूँ मैं उनके जैसी, ये एहसास मुझे कसम से देता हैं सुकून   उनकी सूरत हो या हो सीरत, है वरदान मेरी ज़िन्दगी का   बनूँ मैं माँ जैसी, रहूँ हरदम उनकी जैसी, है ख़्वाब ये मेरा   गुण उनके अपनाऊँ जीवन में अपने, हैं ये कोशिश मेरी   लुटाऊँ उन जैसा प्यार, लाऊँ सबके चेहरे पर मुस्कान  किसी भी परिस्थिति में ना घबराऊँ, बस करूँ सामना उसका   खुद भी सम्भलूँ, औरों को भी सम्भालूँ, रहे ये चेष्टा मेरी   करूँ गर्वित माँ को अपने प्रयासों से, बन जाऊँ उन जैसी   कहतें हैं सब मुझको परछाई माँ की, सुन होता है गर्व   हूँ मैं उनके जैसी, ये एहसास मुझे कसम से देता हैं सुकून     -दीपिका जैन

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Parchai Maa Ki / परछाई माँ की (Poetry On Mother) 


कहतें हैं सब मुझको परछाई माँ की, सुन होता है गर्व 

हूँ मैं उनके जैसी, ये एहसास मुझे कसम से देता हैं सुकून 

उनकी सूरत हो या हो सीरत, है वरदान मेरी ज़िन्दगी का 

बनूँ मैं माँ जैसी, रहूँ हरदम उनकी जैसी, है ख़्वाब ये मेरा 

गुण उनके अपनाऊँ जीवन में अपने, हैं ये कोशिश मेरी 

लुटाऊँ उन जैसा प्यार, लाऊँ सबके चेहरे पर मुस्कान

किसी भी परिस्थिति में ना घबराऊँ, बस करूँ सामना उसका 

खुद भी सम्भलूँ, औरों को भी सम्भालूँ, रहे ये चेष्टा मेरी 

करूँ गर्वित माँ को अपने प्रयासों से, बन जाऊँ उन जैसी 

कहतें हैं सब मुझको परछाई माँ की, सुन होता है गर्व 

हूँ मैं उनके जैसी, ये एहसास मुझे कसम से देता हैं सुकून 


-दीपिका जैन 

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