Kuch Kadmon Ki Doori Thi / कुछ कदमों की दूरी थी (Poetry On Love)
हो गया विस्मित तुझे देखते ही, मेरी विवशता थी
देखी नही थी इतनी खूबसूरती पहले कभी मैने
ऐसा लगा जैसे की तू कोई जन्नत की नूर थी
कर पाना यकीन इस लम्हें पर मेरी मजबूरी थी
करूँ तुझसे कुछ बातें, या रहूँ चुप ये कशमकश थी
करूँ शुरुआत गुफ़्तगू की तो किन अल्फाज़ों से करूँ
आई नहीं थी परिस्थित ऐसी विकट जीवन में कभी
कोई तो बताए ये जिंदगी मेरी कैसे तेरे नाम करूँ
कुछ कदमों की ही दूरी थी, तू मेरे रुबरू थी
हो गया विस्मित तुझे देखते ही, मेरी विवशता थी
-दीपिका जैन

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