Khwahish Zindagi Ki / ख्वाहिश ज़िंदगी की (Poetry On Life)
Khwahish Zindagi Ki / ख्वाहिश ज़िंदगी की (Poetry On Life)
कभी मुस्कान
थी लबों पे, तो कभी बह रहे थे आँसू आँखों से
थी स्थिति
दुविधा की, नहीं पा रही थी समझ, रहूँ खुश या दुखी
ज़िंदगी
के एक नए रूप से हो रही थी रूबरू, आज पहली बार मैं
देकर
खुशियाँ ढ़ेरों माँग रही थी कीमत उनकी मुझसे एक अनमोल
मेरे
अपनों की खुशियों के बदले चाहती थी वो मुझसे मेरी खुशियाँ
चाह ये
ज़िंदगी की करूँ कैसे मुकम्मल, करूँ कैसे कुर्बान हँसी अपनी
चल रही
थी जंग ज़ेहन में मेरे, कि अगले ही क्षण आयी एक आवाज
तेरे
अपनों की खुशियाँ भी तो होंगी तेरी, तो क्यों है इतनी कशमकश
जो देगी
तू अपनों के लिए आयेगा लौटकर वापिस पास तेरे ही यकीनन
ना सोच
इतना कर अर्पित मुस्कुराहट अपनी, मिलेंगी दुआयें बेशुमार तुझे
-दीपिका जैन

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