Yahi Toh Hai Zindagi / यही तो है ज़िंदगी (Poetry On Life )
Yahi
Toh Hai Zindagi / यही तो है ज़िंदगी (Poetry
On Life )
ढूँढ
रहा था खुशियाँ कोई बड़े बड़े महलों में
तो खुश था कोई सूखी घास की झोपड़-पट्टी में
किसी
के सामने रखे थे पकवान बेशुमार प्लेट में
तो
खा रहा था कोई सूखी रोटी संग नमक अंजुरी में
दुखी
था कोई देख सुविधायें अपार अपने घर-आँगन में
तो
मुस्कुरा रहा था कोई टूटी खाट पर बैठ प्रांगण में
खेल
रहे थे किसी के बच्चे खिलौनों से ए. सी. रूम में
तो
कोई पढ़ रहा था किताब हाथ में लिए रोड लाइट में
सो रहा
था कोई लिए चिंताएं बेशुमार अपने ज़ेहन में
तो
कोई कर रहा था विचरण हो बेफिक्र सपनों की दुनिया में
ढूँढ
रहा था खुशियाँ कोई बड़े बड़े महलों में
तो
खुश था कोई सूखी घास की झोपड़-पट्टी में
-दीपिका जैन

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