Darpan Mein Dekha Aks Apna / दर्पण में देखा अक्स अपना (Poetry On Life)
दर्पण में देखा अक्स अपना तो सूरत पे ग़ुरूर हो गया
अफ़सोस सीरत की क्या है अहमियत ये भी भूल गया
है ख़ता ये मेरी हासिल हुए तजुर्बों से जल्द ही जान गया
यूँ तो हर क़दम ज़िंदगी में सूरत की ख़ासियत पहचान गया
फिर भी सीरत के आगे सूरत पे ग़ुरूर मेरा हर बार हार गया
पहचान है इंसा की उसकी सीरत से यक़ीनन ये में जान गया
सूरत और सीरत की जंग में सीरत की जीत को मैं मान गया
कुछ पल की है सूरत की ख़ूबसूरती ख़ुद को मैं समझा गया
बनानी होगी अपनी सीरत काबिल-ए-तारीफ़ ये मैं ठान गया
दर्पण में देखा अक्स अपना तो सूरत पे ग़ुरूर हो गया
अफ़सोस सीरत की क्या है अहमियत ये भी भूल गया
-दीपिका जैन

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