Naari Nahi Hai Bechari / नारी नही है बेचारी (Poetry On Women's Day)
Naari Nahi Hai Bechari / नारी नही है बेचारी (Poetry On Women's Day)
नारी नहीं हैं बेचारी समझ लो तुम ये बात
छीनों ना उससे खुद के लिए जीने का हक़
यूँ तो हर वक़्त सोचती हैं वो दूसरों के लिए
ख़ुद की तो करती नहीं परवाह वो कभी भी
ग़र जीती हैं वो कभी
स्वयं की ख़ुशियों के लिए
तो क्यों छीन लेते हो उसकी सारी ख़ुशियाँ तुम
होती हैं नारी ममता की मूर्त, वात्सल्य से भरपूर
चाहिए उसे तो स्नेह और अपनापन बस थोड़ा-सा ही
थोड़े से प्यार और इज़्ज़त की रहती हैं प्यास उसे
मिलता नहीं जब बेमन से लगती हैं वो मुस्कुराने
आँसू अपने छुपाते हुए पी जाती हैं दुःख सारे अपने
लो ना परीक्षा तुम नारी की करती हैं वो बर्दाश्त बहुत
लेकिन बढ़ जाता हैं जब अत्याचार उस पर बेशुमार
धर लेती हैं रूप कभी दुर्गा तो कभी काली का वो
नारी नहीं हैं बेचारी समझ लो तुम ये बात
-दीपिका जैन
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