Chandraprabha / चंद्रप्रभा (Poetry On Moonlight)

Chandraprabha / चंद्रप्रभा (Poetry On Moonlight)   साँझ ढ़ले, होते ही सूर्योस्त, छा जाती हैं लालिमा आसमां पे   फ़लक पे लगता हैं सजने चाँद, संग अनगिनित सितारों के   फैलाता हैं अपनी चन्द्रप्रभा वसुन्धरा पे चहुँ ओर मृगांक ये   पड़ते ही चन्द्रिका दूर्वा पे, जाती हैं निखर ये अप्रतिम प्रकृति   बिन कुछ कहे ही करती हैं बयां वो अपनी सुंदरता का बखान   जब मुस्कुराते हैं पुष्प अनेक बगियाँ में कुछ खिले- कुछ अधखिले   बगियाँ ही नहीं पर्वतों को भी चूमती हैं चाँद की ये चाँदनी   बढ़ जाती हैं खूबसूरती इस दृश्य की बहता हैं जब झरना पर्वतों से   उसी पल निहारती हैं चन्द्रकला आसमां से सागर की लहरों को   यक़ीनन बेहद ही अद्भुत हैं प्रकृति और इसका रचनाकार   करती हूँ सज़दा उसका लेकिन ढ़ाल नहीं सकती शब्दों में उसको      -दीपिका जैन



Chandraprabha / चंद्रप्रभा (Poetry On Moonlight) 

साँझ ढ़ले, होते ही सूर्योस्त, छा जाती हैं लालिमा आसमां पे 

फ़लक पे लगता हैं सजने चाँद, संग अनगिनित सितारों के 

फैलाता हैं अपनी चन्द्रप्रभा वसुन्धरा पे चहुँ ओर मृगांक ये 

पड़ते ही चन्द्रिका दूर्वा पे, जाती हैं निखर ये अप्रतिम प्रकृति 

बिन कुछ कहे ही करती हैं बयां वो अपनी सुंदरता का बखान 

जब मुस्कुराते हैं पुष्प अनेक बगियाँ में कुछ खिले- कुछ अधखिले 

बगियाँ ही नहीं पर्वतों को भी चूमती हैं चाँद की ये चाँदनी 

बढ़ जाती हैं खूबसूरती इस दृश्य की बहता हैं जब झरना पर्वतों से 

उसी पल निहारती हैं चन्द्रकला आसमां से सागर की लहरों को 

यक़ीनन बेहद ही अद्भुत हैं प्रकृति और इसका रचनाकार 

करती हूँ सज़दा उसका लेकिन ढ़ाल नहीं सकती शब्दों में उसको 

 

-दीपिका जैन 



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