Sanskaar / संस्कार (Poetry On Upbringing)
आज के ज़माने के ये छोटे-छोटे परिवार
ना जाने कहाँ भूल आए हैं अपने संस्कार
होता नही इनमें तो बात करने का लिहाज
बडों का सम्मान करते नही इनके चश्म-ओ-चिराग
मिल-जुलकर रहना आता नही इनको सबके साथ
हकीकत में कसूरवार ये नही, टूटते हुए है
घर-संसार
आज के ज़माने के ये छोटे-छोटे परिवार
ना जाने कहाँ भूल आए हैं अपने संस्कार
जहाँ मिलता नही बच्चो को बुजुर्गो का साया
मिलती नही उनके संस्कारो की छत्रछाया
इससे तो अच्छा था वो पहले का ज़माना
होता था हर बच्चा अपनी दादी-नानी का दीवाना
आज के ज़माने के ये छोटे-छोटे परिवार
ना जाने कहाँ भूल आए हैं अपने संस्कार
-दीपिका जैन

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