Jamghat Baadlon Ka / जमघट बादलों का (Poetry On Clouds)




Jamghat Baadlon Ka / जमघट बादलों का (Poetry On Clouds) 

बेशुमार बादलों का आसमां में जब जमघट सा लग जाता हैं

छुप जाता हैं सूरज भी पीछे उनके, एक मासूम से बच्चे सा

मचाते हैं धमाचौकड़ी फिर ये बादल, करते अपनी मनमर्ज़ी हैं

कभी लगते हैं धीमे-धीमे चलने, तो कभी जाते हैं ठहर वो

खेलते हैं ये जब लुका-छुपी, बन जाता हैं खेल का मैदान आसमां

शरारती बच्चे सी करते हैं अठखेलियाँ, होते हैं बेहद ही नटखट ये

लेकिन यही बादल जगाते उम्मीद आता हैं जब मानसून

बरसकर करते हैं तृप्त हमें, छा जाती हैं खुशियाँ चहुँ ओर

बेशुमार बादलों का आसमां में जब जमघट सा लग जाता हैं

छुप जाता हैं सूरज भी पीछे उनके, एक मासूम से बच्चे सा

 

-दीपिका जैन 

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