Tere Naino Ki Bhasha / तेरे नैनों की भाषा (Poetry On Eyes)

Tere Naino Ki  Bhasha / तेरे नैनों की भाषा (Poetry On Eyes)     तेरे नैनों की भाषा तू ही जाने मैं तो हूँ अंजान इनसे  कभी झुक जाती शर्माकर, कभी बतियाती ढ़ेरों बातें  कभी करती ये मुझको इशारे, कभी बन जाती बेगानी  ख़ूबसूरती तो इनकी होती नहीं शब्दों में बयां मुझसे  यूँ तो खेलना अल्फ़ाज़ों से शौक हैं मेरे बचपन का  पर तेरी इन निगाहों को देख  गया हूँ भूल हुनर अपना  ज़ालिम यूँ ना सता तू मुझको अपने कज़रारें नैनों के सहारे  निकल ही ना जाए जान मेरी तेरी नज़रों के जुल्मों से  तेरे नैनों की भाषा तू ही जाने मैं तो हूँ अंजान इनसे  कभी झुक जाती शर्माकर, कभी बतियाती ढ़ेरों बातें     -दीपिका जैन

                                                 Image by CristiYor from Pixabay


Tere Naino Ki  Bhasha / तेरे नैनों की भाषा (Poetry On Eyes) 


तेरे नैनों की भाषा तू ही जाने मैं तो हूँ अंजान इनसे

कभी झुक जाती शर्माकर, कभी बतियाती ढ़ेरों बातें

कभी करती ये मुझको इशारे, कभी बन जाती बेगानी

ख़ूबसूरती तो इनकी होती नहीं शब्दों में बयां मुझसे

यूँ तो खेलना अल्फ़ाज़ों से शौक हैं मेरे बचपन का

पर तेरी इन निगाहों को देख  गया हूँ भूल हुनर अपना

ज़ालिम यूँ ना सता तू मुझको अपने कज़रारें नैनों के सहारे

निकल ही ना जाए जान मेरी तेरी नज़रों के जुल्मों से

तेरे नैनों की भाषा तू ही जाने मैं तो हूँ अंजान इनसे

कभी झुक जाती शर्माकर, कभी बतियाती ढ़ेरों बातें

 

-दीपिका जैन

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