Drishya Ye Alaukik / द्रश्य ये अलौकिक (Poetry On Nature)


Drishya Ye Alaukik / द्रश्य ये अलौकिक (Poetry On Nature)     नज़रें जहाँ तक भी गयी खूबसूरती ही खूबसूरती नज़र आई  सूर्योदय संग भौंर की पहली किरण पैगाम एक नवीन हैं लाई  कहीं पर्वतों से बहता झरना, तो कहीं थी साहिल को चूमती लहरें  कहीं पंछियों का कलरव, तो कहीं बागों में मुस्कुराते फूल रंग-बिरंगें  कहीं खेतों में लहलहाती फसलें और उनको एकटक निहारता किसान  कहीं गीत सुरीला गाती कोयल, तो कही अद्भुत नृत्य करता मयूर  आसमां पे सजते चाँद और सितारें, अविस्मरणीय हैं द्रश्य ये अलौकिक  नहीं हैं अल्फ़ाज़ पास मेरे करने को वर्णन इस अनुपम कायनात का  नज़रें जहाँ तक भी गयी खूबसूरती ही खूबसूरती नज़र आई  सूर्योदय संग भौंर की पहली किरण पैगाम एक नवीन हैं लाई     -दीपिका जैन


Drishya Ye Alaukik / द्रश्य ये अलौकिक (Poetry On Nature) 


नज़रें जहाँ तक भी गयी खूबसूरती ही खूबसूरती नज़र आई

सूर्योदय संग भौंर की पहली किरण पैगाम एक नवीन हैं लाई

कहीं पर्वतों से बहता झरना, तो कहीं थी साहिल को चूमती लहरें

कहीं पंछियों का कलरव, तो कहीं बागों में मुस्कुराते फूल रंग-बिरंगें

कहीं खेतों में लहलहाती फसलें और उनको एकटक निहारता किसान

कहीं गीत सुरीला गाती कोयल, तो कही अद्भुत नृत्य करता मयूर

आसमां पे सजते चाँद और सितारें, अविस्मरणीय हैं द्रश्य ये अलौकिक

नहीं हैं अल्फ़ाज़ पास मेरे करने को वर्णन इस अनुपम कायनात का

नज़रें जहाँ तक भी गयी खूबसूरती ही खूबसूरती नज़र आई

सूर्योदय संग भौंर की पहली किरण पैगाम एक नवीन हैं लाई

 

-दीपिका जैन 

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