Dar / ड़र (Poetry On Fear)
Dar
/ ड़र (Poetry On Fear)
ड़र, काँप जाती हैं रूह
अलफ़ाज़ ये सुन हम सबकी
लेकिन कभी ना कभी होता हैं ये हिस्सा हमारी ज़िन्दगी का
कभी होती हैं कोई वजह तो, कभी हमें लगता हैं बेवजह ही ड़र
कभी कुछ होने का ड़र, तो कभी कुछ ना होने का ड़र
कभी किसी को खोने का ड़र,
तो कभी नौकरी जाने का ड़र
कभी रिश्ते टूटने का ड़र, तो कभी किसी के रूठ जाने का ड़र
कभी खुद के बीमार होने का ड़र, तो कभी अपनों की चिंता का ड़र
ये ड़र भी बड़ा अजीब हैं, अमीर हो, या ग़रीब सबके संग हैं
छोटी-छोटे लम्हे ख़ुशी के तब्दील हो जाते हैं यूँ अचानक ड़र में
मानसिक रूप से कमज़ोर बना देता हैं ये ड़र हम सबको
हम चाहे या ना चाहे, हमारी ज़िन्दगी का अटूट हिस्सा होता हैं ये ड़र
-दीपिका जैन

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