Red Rose / रेड रोज़ (Poetry On Red Rose)
Red
Rose / रेड रोज़ (Poetry On Red Rose)
शाम ढ़ले मिलते ही कुछ पल फुर्सत के
निहारने लगी मैं बगियाँ में लगे लाल गुलाबों को
बेहद ही खूबसूरत आ रहे थे नज़र वो,
एकाएक ही ठहर गयी निगाहें
मेरी उन पर
सोचने लगी कितना आकर्षक हैं नज़ारा ये प्रकृति का
कितना प्रतिभाशाली हैं इनको बनाने वाला कलाकार
शाम ढ़ले मिलते ही कुछ पल फुर्सत के
निहारने लगी मैं बगियाँ में लगे लाल गुलाबों को
एक तो दी हैं उसने इन गुलाबों को सुंदरता अपार,
और दी इन्हे सुगन्ध भीनी-भीनी महकाती जो पूरा संसार
भँवरे भी होते कायल इनके, गज़ब हैं इनसे सबको प्यार
ग़र ना होते ये तो कितनी बैरंग लगती हमारी ये कायनात
शाम ढ़ले मिलते ही कुछ पल फुर्सत के
निहारने लगी मैं बगियाँ में लगे लाल गुलाबों को
-दीपिका जैन

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