Jhulsaati Ye Garmi / झुलसाती ये गर्मी (Poetry On Summer Season)


Jhulsaati Ye Garmi / झुलसाती ये गर्मी (Poetry On Summer Season)     बड़ी ही बेरहम हैं ये गर्मी, आता ना तरस इसको हम पर  झुलसाती ये रात और दिन, ढूँढ़ते रह जाते शीतलता हम  चलाते कभी पंखा, कूलर और ए. सी. पाने को राहत इससे  तो कभी पीते पानी ठंडा, जूस, कोला और आईसक्रीम  पर होती ना तनिक भी कम ये गर्मी, करती परेशां हमको  आफ़ताब भी दिखाता तेवर अपने, सही ना जाती उसकी तीव्रता  पक्षी हो या पशु या हो इंसा या फिर पेड़ पौधे जाते झुलस  पड़ती जब किरणें जलती हुई इसकी, कैसी हैं ये विडंबना  बड़ी ही बेरहम हैं ये गर्मी, आता ना तरस इसको हम पर  झुलसाती ये रात और दिन, ढूँढ़ते रह जाते शीतलता हम     -दीपिका जैन

                               Image by RÜŞTÜ BOZKUŞ from Pixabay 


Jhulsaati Ye Garmi / झुलसाती ये गर्मी (Poetry On Summer Season)

 

बड़ी ही बेरहम हैं ये गर्मी, आता ना तरस इसको हम पर

झुलसाती ये रात और दिन, ढूँढ़ते रह जाते शीतलता हम

चलाते कभी पंखा, कूलर और ए. सी. पाने को राहत इससे

तो कभी पीते पानी ठंडा, जूस, कोला और आईसक्रीम

पर होती ना तनिक भी कम ये गर्मी, करती परेशां हमको

आफ़ताब भी दिखाता तेवर अपने, सही ना जाती उसकी तीव्रता

पक्षी हो या पशु या हो इंसा या फिर पेड़ पौधे जाते झुलस

पड़ती जब किरणें जलती हुई इसकी, कैसी हैं ये विडंबना

बड़ी ही बेरहम हैं ये गर्मी, आता ना तरस इसको हम पर

झुलसाती ये रात और दिन, ढूँढ़ते रह जाते शीतलता हम

 

-दीपिका जैन

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