Udi-Udi Re Patang (Poetry On Makar-Sankranti)
उड़ी-उड़ी रे पतंग, उड़ी-उड़ी रे
पतंग
देखो आसमां में रंग-बिरंगी उड़ी रे पतंग
हर ओर मच रहा वो काटा का शोर देखो
आ रही हैं घर-घर से तिल-गुड़ की सुगंध
बच्चों के चेहरे चमक रहे देख पतंगों को
मिल रही हैं दुआएं बुज़ुर्गों की सभी को
उड़ी-उड़ी रे पतंग, उड़ी-उड़ी रे
पतंग
देखो आसमां में
रंग-बिरंगी उड़ी रे पतंग
कहते हैं कही इसे पोंगल तो कही उत्तरायण
खिचड़ी और मकर-संक्राति भी हैं इसके नाम
बनता हैं त्यौहार ये विभिन्न-विभिन्न रूपों में
हर रूप बदल देता हैं वातावरण को हर्षौल्लास में
उड़ी-उड़ी रे पतंग, उड़ी-उड़ी रे
पतंग
देखो आसमां में रंग-बिरंगी उड़ी रे पतंग

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