Winter-Time (Poetry On Winter)
शरद ऋतु के द्वारा अपने आगमन का संदेश देते ही
हल्की-हल्की ठंड की चुभन बदन को लगी हैं छूने
सुहावनी लगने लगी हैं तपिश सूरज की हर शख्स को
निकल गए हैं बाहर वस्त्र ऊनी अच्छी लगने लगी हैं रज़ाई
साँझ ढ़ले अलाव सेंकते लोगों का नज़र आने लगा हैं समूह
शरद ऋतु के द्वारा अपने आगमन का संदेश देते ही
हल्की-हल्की ठंड की चुभन बदन को लगी हैं छूने
मक्के की रोटी हो या रोटी बाज़रे की लगने लगी हैं स्वादिष्ट
स्वाद से भरे सूखे मेवों के लड्डू हर घर को लगें हैं
महकाने
गज़क,रेवड़ी और मूँगफली लगी हैं हमारे मन को भाने
शरद ऋतु के द्वारा अपने आगमन का संदेश देते ही
हल्की-हल्की ठंड की चुभन बदन को लगी हैं छूने

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