Dekha Hain Ek Khwaab (Poetry On Dream)
देखा हैं एक ख्वाब, ख्वाहिश हैं हक़ीक़त में उसे तब्दील कर पाऊँ
कदम रहें ज़मी पे मेरे, लेकिन हाथों से आसमां
को छू पाऊँ
कुछ ऐसा कर दिखाऊँ, कि लोगो की भीड़ से आगे
निकल पाऊँ
हो ख़ुद पे यकीं इतना, हुनर से अपने दुनिया में पहचान बना पाऊँ
काँटो से भरी राहों पे चलकर भी, एक दिन मंज़िल तक पहुँच पाऊँ
ऊचाँइयों में इतना ना खो जाऊँ, कि खुद को ही ना पहचान पाऊँ
ऊचाँइयों में इतना ना खो जाऊँ, कि खुद को ही ना पहचान पाऊँ
देखा हैं एक ख्वाब, ख्वाहिश हैं हक़ीक़त में उसे तब्दील कर पाऊँ
कदम रहें ज़मी पे मेरे, लेकिन हाथों से आसमां
को छू पाऊँ

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें