Musafir Zindagi Ke Safar Ka (Poetry On Life)
यूँ तो ज़िंदगी के सफर का मुसाफिर हूँ मैं
लेकिन मंज़िल का कोई मुझे इल्म नहीं
कैसी हैं ये बेबसी रास्तों का भी पता नहीं
यूँ तो हमसफर भी हैं संग मेरे बेशुमार
कुछ अपने से हैं तो कुछ बेगाने से
वाकिफ हूँ इस बात से मुकम्म्ल होगा ये सफर
लेकिन अंज़ा हूँ राहों की मुश्किलों से
यूँ तो ज़िंदगी के सफर का मुसाफिर हूँ मैं
लेकिन मंज़िल का कोई मुझे इल्म नहीं
सुना हैं खुशियाँ भी देती हैं दीदार सफर में
लेकिन ना जाने क्यों डरता हूँ मैं गमों से मिलने में
कहते हैं गले लगा लो तुम गमों को अगर
तो यकीनन वो बदल जाते हैं खुशियों में
और बन जाता हैं सफर ये अविस्मरणिय हमारा
यूँ तो ज़िंदगी के सफर का मुसाफिर हूँ मैं
लेकिन मंज़िल का कोई मुझे इल्म नहीं

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