Pehli Baarish (Poetry On Rain)



बरस-बरसकर ये मेघा देखो, भिगो रहे धरा का आँचल
और देख द्रश्य ये अब हो रहा हैं, सबका मन प्रफुल्लित
कुछ इस तरह से जन-जन ने इन बादलों का किया इन्तजार
कहीं करवाए हवन, तो कहीं इंद्र-देव को किया प्रसन्न
रखे किसी ने व्रत, तो किसी ने अपनी खुशियों का किया त्याग
बेहाल थे गरमी से, इसीलिए ना जाने क्या-क्या नहीं किया

बरस-बरसकर ये मेघा देखो, भिगो रहे धरा का आँचल
और देख द्रश्य ये अब हो रहा हैं, सबका मन प्रफुल्लित
करते हुए बारिश का बेसब्री से इंतज़ार, किसान हुए परेशान
हर तरफ़ बिन पानी पशु-पक्षी का हुआ प्यास से बुरा हाल
त्राहि-त्राहि मच रही चहुँ ओर, जन-जन हुआ बेचैन
धरा भी तो सह तपन सूरज की हो रही हैं बेहाल

बरस-बरसकर ये मेघा देखो, भिगो रहे धरा का आँचल
और देख द्रश्य ये अब हो रहा हैं, सबका मन प्रफुल्लित
फिर प्यासी निगाहों को आसमां में एक बादल हैं नज़र आया
देख जिसे सबके मन में उम्मीदों ने अपना आशियाना बनाया
इतने में ही बारिश की बूंदों ने हर ओर खुशियों को फैलाया
नाचने लगे सब बूढ़े-बच्चें, धरा ने भी हैं सुकून पाया
बरस-बरसकर ये मेघा देखो, भिगो रहे धरा का आँचल
और देख द्रश्य ये अब हो रहा हैं, सबका मन प्रफुल्लित

Happy Rainy Season


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