Pradushit Hoti Dharti (Poetry On World environment Day)




प्रदूषित होती धरती

  
ना जाने क्यों नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती
सूख रही हैं झीले सारी, कट रहे हैं पेड़ निरन्तर
आती थी कभी हरी-भरी नज़र ये धरा सबको
देखो अब किस तरह सूख कर हो गयी हैं बंजर
कुछ तो करो मुझ पे रहम, कह रही ये धरा रोकर
ना जाने क्यों नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती

आती हैं कभी सुनामी, तो कभी आता भूकंप
होता हैं अचरज, फिर भी क्यों नही समझ रहा मानव
हवा में प्रदूषण हैं फैल रहा, बढ़ रही हैं बीमारियाँ अनेक
मर रहे हैं जीव, खत्म हो रही हैं प्रजातियाँ कई
ना जाने क्यों नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती

कहीं सूखा, तो कहीं बाढ़ का खतरा हैं मंडरा रहा
बढ़ रहा हैं ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर हैं पिघल रहा
ओज़ोन परत हो रही हैं पतली, बढ़ रहा हैं तापमान
इन सबके लिए ज़िम्मेदार हैं बेपरवाह ये इंसान
ना जाने क्यों नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती

भय हैं तो सिर्फ इस बात का, कि एक दिन ऐसा आएगा
ना रहेंगे पेड़, ना ही होंगे पौधे, मानव ही मानव को खाएगा
हो जायेंगे पंछी लुप्त, जंगल भी सूने और बंज़र  नज़र आयेंगे
नहीं चेते अभी भी तो, हम पर्यावरण को गवाएँगे
ना जाने क्यों  नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती

वक़्त अभी बीता नहीं, कह रहा हैं हमसे ये ख़ुदा
कुछ आस बची हैं अभी, रोक लो तुम यह तबाही
मिटने ना दो तुम, नामो-निशान इस दुनिया का
देखो दे रही हैं धरा तुमको, अपने आँसुओ की दुहाई
ना जाने क्यों नहीं समझ रही हैं ये मानव जाति
दिन-प्रतिदिन प्रदूषित हो रही हैं हमारी ये धरती


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