Vatsalya (Poetry On Mother's Day)

   

HAPPY  MOTHER'S  DAY


वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो
असहनीय सहकर दर्द वो लाती इस दुनिया में हमको
फिर अगले ही पल देख हमें जाती भूल दर्द वो अपना
समेट लेती आँचल में अपने मुस्कुराते हुए हमको वो
जैसे मिल गयी हो सारे जहाँ की खुशियाँ उसको
वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो


नन्हे-नन्हे क़दमों से जब चलते हम अपने आँगन में
लेती बलाएँ वो हमारी, नज़रें उतारती बार-बार
ग़र जाए लड़खड़ाकर गिर, संभाल लेती वो हमको
लुटाती मातृत्व चूमकर हमेंवो कुछ घबराते हुए
वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो

करते बदमाशियाँ हम इतनी, ना मानते कहना किसी का
कर देते परेशां सबको चाहे ग़ैर हो या वो हो अपना
सुन शिकायत हमारी झट से झड़प देती वो हमको
तुरन्त ही फिर लेती समझा भरकर आँखों में आँसू अपने
वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो

मंजिल हो चाहे कोई भी हमारी, साथ निभाती शिद्दत से वो
  क़ाबिल बनाकर वो हमको, रुबरु करवाती दुनिया से
पड़ना नहीं कमज़ोर कभी तुम, ये सिखाती वो हमको
हो जाए ग़र नाकाम कभी हम, हौंसला बढ़ाती हमारा वो
वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो

कामयाबी की चकाचौंध में भूल भी जाएँ हम उसको
पल भर में ही भूला दे चाहे उसके किए अहसानो को
अपने जीवन के संध्या-काल में भी ख़्याल रखती हमारा वो
देती हुई दुआए हजारों माफ कर देती हमारी हर खता को
वात्सल्य की मूरत हैं वो, एक भोली-सी सूरत हैं वो
ज़मी पे ख़ुदा का फ़रिश्ता हैं वो, कोई ओर नहीं माँ हैं वो




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