Adhkhili-Si Ye Kali (Poetry On Rose Bud))
प्रकृति का सौन्दर्य हैं निखार रही
हर शख्स के कदम जाए थम देख उसे
भँवरे भी तो गुनगुनाए गीत उसके लिए
बैठ शबनम की बूँदें इन पर हैं इतरा रहीं
अधखिली-सी ये कली गुलाब की
प्रकृति का सौन्दर्य हैं निखार रही
कुछ ओर नहीं खुदा की दी हुई दुआ हैं ये
किसी के लबों पे आयी मीठी-सी मुस्कान हैं ये
मनभावन सी कायनात की जान हैं ये
अधखिली-सी ये कली गुलाब की
प्रकृति का सौन्दर्य हैं निखार रही
बनते ही फूल ये और खूबसूरत नज़र आएगी
किसी के आशियाने की शोभा ये बढाएगी
मरने के बाद भी साथ ये हमारा निभाएगी
गर हो ज़रूरत तो कदमों तक में बिछ जाएगी
अधखिली-सी ये कली गुलाब की
प्रकृति का सौन्दर्य हैं निखार रही

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें