Chalchitra Upwan Ka / चलचित्र उपवन का (Poetry On Flowers)


Chalchitra Upwan Ka / चलचित्र उपवन का (Poetry On Flowers)     लाल, गुलाबी, बैंगनी, पीले, नीले रंगों के फूलों से सजा था उपवन  फ़ैली थी चहुँ ओर दूर्वा हरी-हरी, सजी थी उस पर बूँदें शबनम की    बेहद ही मनमोहक था द्रश्य ये, दे रहा था सुकून नज़रों को हमारी  फिर यूँ यकायक ही गुनगुन करता आया भँवरा एक, करीब फूलों के  करने लगा मधुर रसपान उनका, बेपरवाह हो दुनिया की निगाहों से    इतने में आया झोंका हवा का एक, करने लगे नृत्य पुष्प सभी दर्शनीय  हो गए विचलित भँवरें, उड़ने लगे इधर-उधर, तो कोई बैठा था शांत  हो रहा था प्रतीत कुछ ऐसा, चल रहा हो चलचित्र, नज़रों के सामने  बना रहा है जो इस कायनात को रमणीय, फिदा है जिस पर हर शख्स  ख्वाहिश है, थमे नहीं सिलसिला ये अनुपम, रुक जाए सुइयाँ घड़ी की  लाल, गुलाबी, बैंगनी, पीले, नीले रंगों के फूलों से सजा था उपवन  फ़ैली थी चहुँ ओर दूर्वा हरी-हरी, सजी थी उस पर बूँदें शबनम की                                               -दीपिका जैन

                                            Image by Wolfgang_Hasselmann from Pixabay


                        Chalchitra Upwan Ka / चलचित्र उपवन का (Poetry On Flowers


लाल, गुलाबी, बैंगनी, पीले, नीले रंगों के फूलों से सजा था उपवन

फ़ैली थी चहुँ ओर दूर्वा हरी-हरी, सजी थी उस पर बूँदें शबनम की  

बेहद ही मनमोहक था द्रश्य ये, दे रहा था सुकून नज़रों को हमारी

फिर यूँ यकायक ही गुनगुन करता आया भँवरा एक, करीब फूलों के

करने लगा मधुर रसपान उनका, बेपरवाह हो दुनिया की निगाहों से  

इतने में आया झोंका हवा का एक, करने लगे नृत्य पुष्प सभी दर्शनीय

हो गए विचलित भँवरें, उड़ने लगे इधर-उधर, तो कोई बैठा था शांत

हो रहा था प्रतीत कुछ ऐसा, चल रहा हो चलचित्र, नज़रों के सामने

बना रहा है जो इस कायनात को रमणीय, फिदा है जिस पर हर शख्स

ख्वाहिश है, थमे नहीं सिलसिला ये अनुपम, रुक जाए सुइयाँ घड़ी की

लाल, गुलाबी, बैंगनी, पीले, नीले रंगों के फूलों से सजा था उपवन

फ़ैली थी चहुँ ओर दूर्वा हरी-हरी, सजी थी उस पर बूँदें शबनम की


                                           -दीपिका जैन 

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