Milti Nahi Tripti / मिलती नहीं तृप्ति ( Poetry On Life)

Milti Nahi Tripti / मिलती नहीं तृप्ति ( Poetry On Life)   आता है ख्याल ज़ेहन में, क्या चाहता इंसा, क्या मिलता है   जो है पास, करता नहीं कद्र, जो नहीं, तरसता उसके लिए   अज़ब है दास्तां ज़िन्दगी की, मिलती नहीं तृप्ति  किसी को   औरों का आँगन लगता है सदा हरा-भरा, खुद का बंज़र    करते हैं ईर्ष्या, ग़ैरों की बरकत से, ऐसी क्यों होती फ़ितरत   चेहरे पर ओढ़े ख़ुशी का नक़ाब, जुबां पे लाते शब्द द्वेष  के   ख़ुदा की नेमत से चाहे ख़ुशियों के दरवाज़ें खुले हो सभी   फिर भी आते नहीं है नज़र, ऐसे लोगो की निग़ाहों को   दुखों से भरी एक खिड़की ही काफी है, आँसू बहाने को   आता है ख्याल ज़ेहन में, क्या चाहता इंसा, क्या मिलता है   जो है पास, करता नहीं कद्र, जो नहीं, तरसता उसके लिए                                                                   -दीपिका जैन


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Milti Nahi Tripti / मिलती नहीं तृप्ति ( Poetry On Life)


आता है ख्याल ज़ेहन में, क्या चाहता इंसा, क्या मिलता है 

जो है पास, करता नहीं कद्र, जो नहीं, तरसता उसके लिए 

अज़ब है दास्तां ज़िन्दगी की, मिलती नहीं तृप्ति  किसी को 

औरों का आँगन लगता है सदा हरा-भरा, खुद का बंज़र  

करते हैं ईर्ष्या, ग़ैरों की बरकत से, ऐसी क्यों होती फ़ितरत 

चेहरे पर ओढ़े ख़ुशी का नक़ाब, जुबां पे लाते शब्द द्वेष  के 

ख़ुदा की नेमत से चाहे ख़ुशियों के दरवाज़ें खुले हो सभी 

फिर भी आते नहीं है नज़र, ऐसे लोगो की निग़ाहों को 

दुखों से भरी एक खिड़की ही काफी है, आँसू बहाने को 

आता है ख्याल ज़ेहन में, क्या चाहता इंसा, क्या मिलता है 

जो है पास, करता नहीं कद्र, जो नहीं, तरसता उसके लिए 


                                                              -दीपिका जैन

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