Doobaa Tha Soch Mein / डूबा था सोच में (Poetry On Nature )
सागर
किनारे बैठा, डूबा था गहरी सोच में
चाँदनी
रात थी, चमक रहा था चाँद फलक पे
तारें
भी थे असंख्य, कुछ कम, कुछ अधिक चमकते हुए
सुहावना
था मौसम, चल रही हवाएँ, शीतल-शीतल
हर
तरफ था सन्नाटा पसरा हुआ,
शान्त था वातावरण
आवाजें
थी तो बस लहरों के साहिल से टकराने की
या
फिर विशालकाय पेडों की डालियों के हिलने की
कुछ
पल के लिए लगा सोच पे अपनी पूर्णविराम
डूब
गया इस प्रकृति में, भूल गया स्वयं का अस्तित्व
आया
था संग जिस तनाव के, उसकी वजह तक भूल गया
हुआ
था रुबरू पहली बार इससे, अब इसी का होकर रह गया।
-दीपिका जैन

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