Shabdheen Hai Ye / शब्दहीन है ये (Poetry On Flowers)
Shabdheen Hai Ye / शब्दहीन है ये (Poetry On Flowers)
संसार पुष्पों का लग रहा अतिसुन्दर अरुणिमा की बेला में
हरी – हरी दूर्वा पर बूँदें शबनम की नजर आ रहीं हैं गज़ब
अलसाई-सी सुबह, देख दृश्य ये कुछ इस तरह से रही है
मुस्कुरा
बिखर रही है हर ओर खुशियाँ बेशुमार, अद्भुत है नज़ारा ये
जहाँ रखूँ कदम मैं अपने, हो रहा एक अनुभव नया है उपवन
में
देखी नहीं कभी ऐसी सुंदरता और ताजगी मैने कभी जीवन में
थम जाए वक्त यहीं कुछ देर के लिए, है ख्वाहिश कुछ ऐसी
मेरी
जानती हूँ मुमकिन नहीं, फिर भी कर रही हूँ दरख्वास्त
खुदा से
होगी नहीं कबूल वो, फिर भी भूल सबकुछ, बैठ निहार रहीं
हूँ चहुँ ओर
यकीनन बेहद ही खूबसूरत है मंज़र ये कुदरत का, शब्दहीन है
ये
-दीपिका जैन

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