Bediyan Mazboori Ki / बेड़ियाँ मजबूरी की (Poetry On Compulsion)
क्या करूँ, क्या नहीं, स्थिति है असमंजस की
जकड़ दिया हो बेड़ियों से हो रहा है ये एहसास
तड़प रही हूँ होने को आजाद, हर पल हर क्षण
नहीं ये बेड़ियाँ लोहे की, ये तो हैं
मजबूरी की
हो ना रुबरू कोई इनसे, गैर हो या
अपना वो
होती है तकलीफ बेशुमार, की नहीं
जाती बयान
बढ़ जाता है दर्द बेहिसाब, होता नहीं
बर्दाश्त
हो जाती है हद पार, करता नहीं यकीं जब देने वाला
कैसे समझाए उसे व्यथा अपनी, स्थिति है असमंजस की
जकड़ दिया हो बेड़ियों से हो रहा है ये एहसास
-दीपिका जैन

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